Wednesday, November 9, 2011

टुकड़े टुकड़े





टुकड़े टुकड़े जोड़ कर
एक घर मैंने बनाया था,
उस घर के एक कोने में
खुद को मैंने पाया था..

रोज़ अब मैं एक नया घर बनाता हूँ
उस कोने की चाह में,
बीता हुआ कल मिल जाए शायद
इस घरोंदे की पनाह में..

हर शाम ले आती हैं हवाएं
एक टुकड़ा उस घर का,
रोज़ बिखर कर रह जाता है
खोखली दीवारों का यह किस्सा ..

जिन हवाओं में उड़ता था मैं
आज वे ही आँधियों सी लगती हैं,
जो फिज़ा लोरी सुनाया करती थी
उसकी दस्तक अब नींद से जगाया करती है..

टुकड़े टुकड़े जोड़ कर
एक घर मैंने बनाया था,
उस घर के एक कोने में
खुद को मैंने पाया था..